कभी भारत की पहचान थी जो ‘लंगोट’, वह आज ‘अंडरवियर’ में कैसे बदल गई?

‘लंगोट कस लोग’ 

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ये एक लाइन आप ने कई फिल्मों में और कई बार लोगों के मुंह से मुहावरे के तौर पर निकलती हुई जरूर सुनी होगी. इसे सुनने के बाद आपके ज़ेहन में कुछ सवाल भी जरूर आए होंगे…

सवाल यह कि जिस लंगोट के बारे में हम इतना बोलते हैं, आखिर वह लंगोट आज कहीं दिखती क्यों नहीं? क्यों सिर्फ पहलवानों तक ही लंगोट सीमित रह गई है? क्यों हम देशी लंगोट छोड़, विदेशी अंडरवियर पहनने लगे हैं?

अगर आपके जेहन में भी ऐसे ही सवाल आते हैं, तो चलिए आज जानते हैं कि कैसे भारत लंगोट पीछे छोड़ अंडरवियर पहनने लगा–

रामायण और महाभारत से जुड़े हैं लंगोट के तार…

लंगोट का साथ हमारे साथ आज का नहीं बल्कि कई वर्षों पुराना है. माना जाता है कि पौराणिक काल से ही लंगोट इंसानों से जुड़ गई थी. 

इसे लिंग को ढ़कने के लिए बनाया गया था मगर कभी भी इसे किसी इनरवियर की तरह इस्तेमाल नहीं किया गया. लंगोट को हमेशा ही बाहर पहना गया. 

लंगोट कब आई और किसने इसकी शुरुआत की यह किसी को भी सही रूप से पता नहीं है. हां, मगर इसका इस्तेमाल बहुत लंबे समय से होता आ रहा है. 

धारणाओं की मानें, तो रामायण के समय भगवान हनुमान लंगोट पहने हुआ होते थे. उनकी लंगोट लाल रंग की थी. यह लंगोट दर्शाती थी कि वह ब्रह्मचर्य जीवन का पालन करते हैं. Newsletter

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इतना ही नहीं माना जाता है कि यह लंगोट शारीरिक बल को भी दर्शाती थी और मानिसक स्थिरता भी प्रदान किया करती थी. 

यही कारण है कि आज भी हनुमान जी की मूर्ति एक लाल लंगोट के साथ दिखाई देती है. यह तो बात थी रामायण की मगर महाभारत में भी लंगोट का ज़िक्र किया गया है. 

महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था. ऐसे में दुर्योधन की माता गांधारी को यह भय था कि कहीं युद्ध में उनके पुत्र की मृत्यु न हो जाए. इसलिए वह चाहती थीं कि कुछ भी करके दुर्योधन को इस युद्ध में कोई क्षति न पहुंचे.

गांधारी ने एक दिन दुर्योधन को अपने पास नग्न अवस्था में बुलाया ताकि वह अपने वरदान से उसे बलशाली बना दें. हालांकि, श्री कृष्ण उनके सामने आते हैं और वह दुर्योधन को कहते हैं कि ऐसे नग्न होकर माँ के सामने जाना ठीक नहीं है. इसलिए वह उन्हें पत्तों से बनी एक लंगोट पहनने को कहते हैं. 

लंगोट के कारण दुर्योधन की जांघ में ताकत नहीं आ पाती, जिसके कारण उसकी आगे चलकर मौत भी हो जाती है. महाभारत के इस किस्से में भी लंगोट का ज़िक्र किया गया है. यह दर्शाता है कि पौराणिक काल से किस तरह से लंगोट इंसानों से जुड़ा हुआ है. 

Langot Is Famous Since Ancient Times (Pic: sidthewanderer)

सिंधु घाटी सभ्यता में दिखा लंगोट का नया रूप!

सिर्फ रामायण और महाभारत तक ही लंगोट का इतिहास सीमित नहीं रहा. इसके इस्तेमाल के कुछ सबूत सिंधु घाटी में भी मिले.

माना जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता में लोग अपने तन को ढ़कने के लिए लंगोट का ही इस्तेमाल करते थे. हाँ, मगर उस समय लंगोट आम कपड़े की बनी लंगोट से थोड़ी अलग होती थी. 

यह थोड़ी लंबी होती थी और इसका एक हिस्सा लंगोट से निकलकर अंगवस्त्र की तरह शरीर से बाँधा जाता था. इससे यह पूरी तरह से उनके बदन को ढ़कने वाला एक वस्त्र बन जाता था.

इतना ही नहीं माना जाता है कि सिंधु घाटी में कई लोग भेड़ की ऊन से बने लंगोट भी पहना करते थे. वहीं कुछ लोग जानवरों की खाल से बने लंगोट पहना करते थे. 

लंगोट पहनने का उनका एक मात्र मकसद यही था कि वह अपने निजी अंगों को ढकना चाहते थे.

People In Indus Valley Civilization Used To Wear A Different Kind Of Langot (Representative Pic: steemit)

गुरु गोबिंद सिंह लेकर आए ‘कच्छा’ मगर…

जैसे-जैसे वक्त गुजरा लंगोट का चलन पीछे छूटने लगा. अब तन ढकने के लिए धोती जैसी कई चीजें आ चुकी थीं. लोगों को भी कभी इनरवियर के रूप में कुछ पहनने की जरूरत महसूस नहीं हुई. 

कई सालों तक ऐसे ही चलता रहा मगर 1699 में दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ‘कच्छा’ नामक एक नई चीज दुनिया के सामने लाए. 

इसे सिख धर्म के पाँच ककार में से एक माना गया. इसे बनाया ही इसलिए गया था ताकि सभी सिख इसके जरिए अपने निजी अंगों को छिपा सकें. 

यह कच्छा सिर्फ पुरुषों के लिए ही नहीं बनाया गया बल्कि महिलाओं को भी यह पहनने के लिए दिया गया. यह कपड़े के टुकड़ों को सिलकर बनाया जाता था. 

धारणाओं की मानें तो, कच्छा इसलिए भी पहना जाता था ताकि सिखों का ध्यान न भटकें, वह अपने लक्ष्य की ओर ही खुद को समर्पित रखें. 

ये कच्छा सिखों के बीच तो काफी प्रसिद्ध हुआ मगर बाकी लोगों ने इसे नहीं अपनाया. लोग काफी वक्त तक बिना किसी निजी अंग के वस्त्र के रहे. अपनी धोती के नीचे वह कुछ भी नहीं पहनते थे. 

इतना ही नहीं वक्त गुजरा तो, कच्छा भी विलुप्त होने लगा. भारत में लोगों ने इसके होने न होने पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं दिया. 

Underwear Is One Of The Five K’s Of Sikhism (Pic: daydreameducation)

अंग्रेजों ने मिलाया मॉडर्न जमाने के अंडरवियर से

गुरु गोबिंद सिंह द्वारा लाया गया कच्छा भी लोगों को ज्यादा दिन तक अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पाया. थोड़े ही समय में लोग इसे भी भूल गए. लंगोट अभी भी चलती थी मगर सिर्फ पहलवानों के लिए. 

वक्त गुजरा और भारत में अंग्रेज आ गए और साथ ही वह अपने साथ कई विदेशी चीजें भी लाए. इनमें से एक था ‘बॉक्सर शॉर्ट्स’.

ब्रिटिश अपने साथ इलास्टिक वाले बॉक्सर शॉर्ट्स लेकर आए थे. इन शॉर्ट्स को सीधे तौर पर एक अंडरवियर के रूप में पहना जाता था. 

पश्चिमी देशों में अंडरवियर का चलन शुरू हो चुका था मगर भारत में अभी तक किसी ने इसके बारे में नहीं सोचा था. अंग्रेजों के लाए हुए ये बॉक्सर शॉर्ट्स कई भारतीयों को तो पसंद आए मगर बाकी इससे दूर ही रहे. 

थोड़े बहुत लोगों ने इन्हें पहनने में रुचि दिखाई. भारतीयों में अंडरवियर की थोड़ी चाह दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बढ़ी. जितने भी भारतीय सैनिक ब्रिटिश की ओर से लड़ने गए थे उन सभी को बॉक्सर शॉर्ट्स दिए गए थे. 

इतना ही नहीं खुद उन्होंने भी इसे काफी बढ़िया माना और इसे अपनाया. माना जाता है कि वहीं से अंडरवियर रेवोलुशन की एक हलकी सी हवा चली थी. कई लोगों ने इसकी जरूरत को महसूस किया. 

हालांकि, भारत का एक बड़ा हिस्सा अभी भी इससे दूर था. 

British Brings Boxer Shorts In India (Representative Pic: envisioningtheamericandream)

…और जब भारत में आया अंडरवियर रेवोलुशन

यह दौर था 1970 का. लोग अब धोती नहीं बल्कि पैंट पहनने लगे थे. पैंट के अंदर लंगोट पहनना असहज लगता था. वहीं दूसरी ओर अंडरवियर का कोई ख़ास मार्किट भी नहीं था. इसलिए यह सबके लिए उपलब्ध नहीं थी.

जो अंडरवियर उस समय मौजूद थे वह काफी बड़े थे और पैंट में असहजता महसूस करवाते थे. ऐसे में जब इन्हें साइड से काटकर छोटा किया गया और एक नया शेप दिया गया, तो भारत में एक नई लहर शुरू हो गई. 

कुछ एक अंडरवियर ब्रांड इंडिया में शुरू हो गए और लोगों ने भी उन्हें अपनाना शुरू किया. माना जाता है कि बॉलीवुड ने भी अंडरवियर को काफी प्रमोट किया. 

कई फिल्मों में अंडरवियर को दर्शाया गया. वहीं कितने ही बॉलीवुड स्टार्स ने अंडरवियर ब्रांड्स को प्रमोट किया. इसके बाद, तो आम लोगों में अंडरवियर खरीदने की एक होड़ सी लग गई. 

बहुत ज्यादा वक्त नहीं लगा भारत में अंडरवियर मार्किट को बढ़ने में. थोड़े ही वक्त में कई सारे अंडरवियर ब्रांड्स लोगों के सामने आ गए. इतना ही नहीं वक्त के साथ अंडरवियर का साइज़ भी छोटा होता गया. इसे ज्यादा से ज्यादा सहज बनाने की कोशिश होती रही.

Bollywood Also Helped To Raise Underwear Revolution In India (Pic: googleplus)

करोड़ों का हो चुका है आज अंडरवियर मार्किट!

कभी जिस भारत में अंडरवियर का वजूद ही नहीं था, वहां आज ये इतना बड़ा मार्किट बन चुका है कोई सोच भी नहीं सकता. 

आज भारत में इतनी बड़ी संख्या में अंडरवियर बेचे जाते हैं कि कंपनियों को बहुत बड़ा मुनाफा इससे होता है. अंडरवियर मार्किट की इस कामियाबी का सबूत है 2018 के सेल्स रिपोर्ट. 

इसके आंकड़े दर्शाते हैं कि किस तरह से अंडरवियर मार्किट लगातार बढ़ता ही जा रहा है. आंकड़ों के हिसाब से अब तक 2018 में अंडरवियर मार्किट में करीब 13,848 मिलियन डॉलर का रेवेन्यू जेनरेट हो चुका है. 

इनता ही नहीं सालाना यह मार्किट 11 प्रतिशत की दर से बढ़ता जा रहा है. यह आंकड़े बताते हैं कि कभी लंगोट पहनने वाले भारत में आज अंडरवियर किस तरह से प्रसिद्ध हो चुकी है. 

आज भी बचा है लंगोट का वजूद…

आज अधिकाँश लोग भारत में अंडरवियर पहनने लगे हैं मगर इसका मतलब यह नहीं है कि लंगोट का वजूद ही ख़त्म हो गया. आज लंगोट बहुत कम लोगों द्वारा पहनी जाती है मगर यह विलुप्त नहीं हुई है. 

आज साधू और पहलवानों को लंगोट पहने देखा जा सकता है. इन्होंने लंगोट को बचा के रखा हुआ है. लंगोट भले ही आम जीवन से दूर जा रही है मगर लोगों की श्रद्धा में आज भी यह जीवित है. 

हर साल होने वाले ‘लंगोट अर्पण’ मेले को देखकर पता चलता है कि लंगोट आज भी बहुत मायने रखती है. बिहारशरीफ में बाबा मणि राम की समाधि पर हर साल लोग आकर लंगोट चढ़ाते हैं. 

कई सालों से यह प्रथा जारी है. लोग अपनी किसी ख्वाइश के साथ यहाँ आते हैं और बाबा को लंगोट चढ़ाते हैं. धारणाओं की मानें तो, बाबा यहाँ आने वाले हर व्यक्ति की मनोकामना पूरी करते हैं. 

यहाँ पर बाबा मणि राम द्वारा बनाया गया एक अखाड़ा है, जहाँ हर साल गुरु पूर्णिमा पर एक भव्य लंगोट अर्पण मेला लगता है. कई बड़े-बड़े लोग और नेता यहाँ पर लंगोट चढ़ा चुके हैं. 

इस मेले को देखकर आभास होता है कि लंगोट की अहमियत आज भी पहले जैसी ही है. आज भी इसे पहले के जैसे लाभकारी माना जाता है. 

Wrestlers Still Used To Wear Langot’s (Pic: sobanek)

भारत का लंगोट से अंडरवियर पर आने का सफर वाकई में काफी रोचक था. किस तरह से इंसान की जरूरतें बदलती हैं, यह इस कहानी के जरिए समझ आता है. आज भले ही लोग लंगोट से अंडरवियर पर आ गए हैं मगर लंगोट का महत्व जरा भी कम नहीं हुआ है. आज भी इसकी साख बरकरार है.

लंगोट की इस कहानी के बारे में आपके क्या विचार हैं, कमेंट बॉक्स में हमें जरूर बताएं.