बाबा हरभजन सिंह: एक शहीद, जो मरने के बाद भी देश की भारत-चीन बॉर्डर की पहरेदारी कर रहा है!

ये कहानी है दिल्ली से लगभग 1600 किलोमीटर दूर भारत के सिक्किम राज्य में ठंडी वादियों में बसे नाथूला दर्रा के पास भारत-चीन बॉर्डर की.

इसी नाथूला दर्रा के ठीक दक्षिण में 10 किलोमीटर दूर 13 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर बना है एक मंदिर, जो देखने पर एक बंकर जैसा प्रतीत होता है.

इस मंदिर के अंदर हैं बाबा हरभजन सिंह और उनके वो सभी साजो-सामान, जो एक भारतीय सैनिक होने के नाते उनके पास थे. उनकी फौजी वर्दी, उनके जूते आज भी इसी मंदिर में रखे हैं.

जी हां! आज भारत के जांबाज सैनिक हरभजन सिंह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ये मंदिर हमेशा उनकी मौजूदगी का ऐहसास कराता है.

यही नहीं, भारत-चीन बॉर्डर की सुरक्षा में तैनात भारतीय सैनिकों का मानना है कि आज भी बाबा हरभजन सिंह इस बॉर्डर की निगरानी करते हैं और हमें आने वाले खतरों के प्रति आगाह करते हैं.

ऐसे में आइए, जानते हैं कि आखिर कौन हैं बाबा हरभजन सिंह, जो शहीद होने के बाद भी हिंदुस्तान की पहरेदारी कर रहे हैं –

22 साल की उम्र में हुए शहीद
बाबा हरभजन का जन्म 30 अगस्त 1946 को जिला गुजरांवाला (वर्तमान पाकिस्तान में) के सदराना गांव में हुआ था. हरभजन सिंह ने सन 1955 में डी.ए.वी. हाईस्कूल, पट्टी से मैट्रिक पास किया था.

इसके बाद जून सन 1956 में हरभजन सिंह अमृतसर में एक सैनिक के रूप में भारतीय सेना की सिग्नल कोर में शामिल हो गए. माना जाता है कि 30 जून, 1965 को इन्हें कमीशन प्रदान कर 14 राजपूत रेजिमेंट में तैनात कर दिया गया.

इसके बाद इन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में भी भाग लिया था. शायद इसके बाद इनका स्थानांतरण 18 राजपूत रेजिमेंट के लिए कर दिया गया. कहा ये भी जाता है कि 9 फरवरी 1966 को हरभजन सिंह भारतीय सेना की पंजाब रेजिमेंट में एक सिपाही के तौर पर भर्ती हुए थे.

सन 1968 में बाबाजी 23वीं पंजाब रेजिमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम में तैनात थे. इसी साल 4 अक्टूबर 1968 को घोड़ों के एक काफिले को तुकु ला से डोंगचुई ले जाते समय सैनिक हरभजन सिंह का पैर फिसल गया और ये गहरी खाई में जा गिरे.

माना जाता है कि पानी के तेज बहाव में वो लगभग 2 किलोमीटर तक दूर चले गए. शायद खाई में गिरने और नाले में बहने के कारण 22 साल की उम्र में इनकी मौत हो गई.

कहा जाता है कि इसके बाद सिपाहियों ने इन्हें बहुत ढुंढा, लेकिन ये कहीं नहीं मिले. फिर कुछ दिन बाद हरभजन सिंह अपने एक साथी सैनिक प्रीतम सिंह के सपने में आए और उन्हें अपनी मौत की जानकारी दी. उन्होंने सैनिक को ये भी बताया कि उनका शरीर अभी किस जगह पड़ा है.

उनकी यूनिट ने सिपाही के बताए अनुसार खोजबीन शुरू की. आखिरकार थोड़ी मेहनत के बाद वीर सिपाही का पार्थिव शरीर ठीक उसी जगह अपनी राइफल के साथ पड़ा मिला, जहां उनके साथी सैनिक के सपने में बताया गया था.

बहराहाल, माना ये भी जाता है कि सपने में बाबा हरभजन सिंह ने साथी सैनिक से एक समाधि बनाने का अनुरोध भी किया था. ऐसे में सेना के अधिकारियों ने छोक्या छो नामक स्थान पर उनकी समाधि का निर्माण कराया. इसके बाद 11 नवंबर 1982 को एक नया मंदिर इस स्थान पर बना दिया गया.

बाबा हरभजन सिंह मैमोरियल मंदिर आज सिक्किम की राजधानी गंगटोक से लगभग 52 किमी दूर नाथुला और जेलेप्ला पास के बीच 13,123 फीट की ऊंचाई पर स्थित है. आमतौर पर त्सोंगो झील या नाथुला पास की यात्रा के साथ इस मंदिर को शामिल किया जाता है.

बाबा हरभजन सिंह को समर्पित इस मंदिर में हरभजन सिंह के जूते और बाकी सैनिक का सामान आज भी रखा है. जिसकी वहां तैनात सैनिकों द्वारा देखभाल की जाती है. भारतीय जवान इस मंदिर की चौकीदारी करते हैं.

करते हैं भारत-चीन बॉर्डर की निगरानी!
कहा जाता है कि अपनी मौत के बाद भी बाबा हरभजन सिंह अपनी ड्यूटी पर तैनात रहे.

वहीं, मान्यता है कि मौत के बाद से ही उनकी आत्मा भारत-चीन बॉर्डर की निगरानी करती है. वहीं, उन्होंने अपनी तैनाती के दौरान चीन की घुसपैठ के बारे में भारतीय सैनिकों को सतर्क भी किया है.

यहां तक कि भारतीय सेना ने आज भी एक सजग सैनिक के तौर पर उनकी सेवाओं को जारी रखा हुआ था. कुछ साल पहले ही वह अपने पद से रिटायर हुए हैं. माना जाता है कि उन्हें अपनी ड्यूटी के लिए वेतन की सुविधा भी दी जाती थी.

हालांकि, चूकि वो आज अगर जिंदा होते तो भारतीय सेना से रिटायर हो चुके होते, ऐसे में उन्हें अब केवल पेंशन दी जाती है. ड्यूटी पर रहने के दौरान बाबा हरभजन सिंह की पदोन्नति भी की गई. माना जाता है कि एक सिपाही के तौर पर भर्ती हुए हरभजन सिंह कैप्टन के पद से रिटायर हुए थे.

वहीं, बतौर एक सैनिक उन्हें दो महीने की छुट्टी भी दी जाती थी. माना जाता है कि एक जुलूस के रूप में उनकी वर्दी, टोपी, जूते व अन्य सैन्य सामान सैनिक गाड़ी में नाथुला से न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन तक लाए जाते हैं. यहां से उन्हें डिब्रूगढ़-अमृतसर एक्सप्रेस रेलगाड़ी से पंजाब के जालंधर और फिर यहां से एक विशेष सैन्य गाड़ी से उनका सामान उनके गांव ले जाया जाता है.

छुट्टी खत्म होने के बाद उन्हें पुन: इसी प्रकार से वापस उनके नाथूला के पास बने बंकर में तैनात कर दिया जाता.

आज हरभजन सिंह को शहीद हुए पूरे 50 साल हो चुके हैं, लेकिन चीन सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों के लिए उनका देश प्रेम आज भी अटल है.

अगर आज हरभजन सिंह जिंदा होते तो, उनकी उम्र लगभग 72 साल होती.

बहरहाल, नाथूला में बना बाबा हरभजन सिंह को समर्पित मैमोरियल मंदिर भारतीय सैनिकों के जज्बे और उनके साहस को दर्शाता है. शायद यही कारण है कि बाबा हरभजन सिंह को ‘नाथूला का हीरो’ भी कहा जाता है.

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