चीन की जगह नहीं ले सकता भारत, पीछे छोड़ने की बात मज़ाक के अलावा कुछ नहीं: चीन

मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों का चीन छोड़ने से उसका मैन्युफैक्चरिंग हब का तमगा छिन सकता है. ये चीन के लिए ये बहुत बड़ा झटका साबित होने वाला है और भारत के लिए बड़ा फायदा

modi china
ये कंपनियां छोड़ रही हैं चीन
चीन से भारत आने की शुरुआत जर्मनी की फुटवियर कंपनी ‘कासा एवर्ज़ गंभ’ के साथ हो चुकी है. वॉन वेल्क्स ब्रांड से फुटवियर बनाने वाली ये कंपनी भारत में शुरुआती 110 करोड़ का निवेश कर रही है. ये कंपनी चीन में सालाना 30 लाख फुटवियर का उत्पादन कर रही थी. जो कि अब उत्तर प्रदेश में लगाई गई यूनिट से किया जाएगा. कंपनी मानती है कि भारत दुनिया का अगला मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस होगा.
इसके अलावा  भारत की फार्मा कंपनियां चीन के विकल्प के तौर पर उभरने के लिए तैयार हो चुकी हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि केमिकल्स और फार्मा दो सेक्टर हैं जहां भारत बड़ी भूमिका निभा सकता है.
फिलहाल दुनिया की 750 बिलियन डॉलर की केमिकल इंडस्ट्री में भारत का हिस्सा 3 फीसदी है जिसके बढ़ने की पूरी संभावना है.भारत में जिन वैश्विक फर्मों ने रुचि दिखाई है, उनमें अमेरिका के मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों टेलिडेने और एम्फेनोल के निर्माता हैं, और जॉनसन एंड जॉनसन जैसे मेडिकल उपकरण निर्माता हैं. मेडट्रोनिक पीएलसी और एबट लेबोरेटरीज़ भी भारत में यूनिट लगाने के लिए बात कर रही है.
सूत्रों के मुताबिक कम से कम 300 कंपनियां मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, मेडिकल डिवाइसेज, टेक्सटाइल्स, लेदर, ऑटो पार्ट्स और सिंथेटिक फैब्रिक्स सहित कई क्षेत्रों के 550 प्रोडक्ट के लिए भारत में फैक्ट्रियां लगाने के लिए सरकार के संपर्क में हैं.

मोदी सरकार कर रही है तैयारी
फार्मा सेक्टर में आ रहे मौके को देखते हुए ही मोदी सरकार ने मार्च में 1.3 बिलियन डॉलर के इन्सेंटिव पैकेज की घोषणा की थी ताकि दवाओं के उत्पादन के साथ साथ मैन्युफैक्चरिंग हब के तौर पर भी इसे उभारा जा सके. जापान ने कोरोनोवायरस महामारी के बाद अपनी कंपनियों को चीन से बाहर उत्पादन में मदद करने के लिए 2.2 बिलियन डॉलर का निवेश किया है.
उधर यूरोपीय संघ ने चीन पर अपनी निर्भरता कम करने की शुरुआत कर दी है. इनमें से ज़्यादातर देशों की कंपनियों की दिलचस्पी भारत में यूनिट लगाने में है और यही बात ड्रैगन को खाए जा रही है.
चीन में सबसे अहम चीज थी लेबर और इंफ्रास्ट्रक्चर. एक तो वहां सस्ती लेबर है, आसानी से मिल जाती है और ऊपर से चीन की कम्युनिस्ट सरकार लेबरों के लिए जो नियम बना देती है, उसे सब मानते हैं. ऐसे में कंपनियों को लेबर की तरफ से या लेबर के लिए कोई दिक्कत नहीं होती है. इसके अलावा चीन ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर खूब काम किया है. चीन में पोर्ट्स को हाईवे के ज़रिए तमाम औद्योगिक शहरों से जोड़ा गया है. यही वजह है कि कंपनियां चीन में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने में दिलचस्पी दिखाती थीं. लेकिन कोरोना संकट के बाद स्थिति बदल गई है.
बेचैन हो रहा है चीन
कई कंपनियों के चीन छोड़ भारत में मैन्यफैक्चरिंग यूनिट लगाने की खबर आने के बाद चीन  भड़क गया है. चीन की कम्युनिस्ट सरकार के माउथपीस  चाइनीज डेली ग्लोबल टाइम्स ने बौखलाते हुए लिखना शुरु कर दिया है कि भारत कभी भी चीन का विकल्प नहीं बन सकेगा. वह लिखता है कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश ने चीन में मैन्युफैक्चरिंग करने वाली उन कंपनियों को अपने यहां शिफ्ट करने के लिए एक इकोनॉमिक टास्क फोर्स का गठन किया है. लेकिन ये केवल एक सपना है कि कोरोना के कारण आर्थिक दबाव झेल रहे चीन को पछाड़ कर भारत दुनिया का अगली फैक्टरी बन सकता है. ये केवल राष्ट्रवादी सोच और शेखी बघारने से ज़्यादा कुछ नहीं.

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