अपनी पहचान क्यों छिपाता है बिहार का बेटा सुशांत सिंह राजपूत

पिछले दिनों गांव के एक स्कूली दोस्त से बात हो रही थी। टीवी और अखबारों से मिली खबरों ने उसके दिमाग में भर दिया था कि इस मामले में रिया ही पूरी तरह से दोषी है और यह कि सीबीआई के हाथों में केस जाने के पहले महाराष्ट्र पुलिस सही जांच नहीं कर रही थी। वह देर तक मुझे समझाने में लगा रहा। जब देखा कि मैं प्रचारित तथ्यों से सहमत नहीं हो पा रहा हूं तो उसने आखिरी बात कही, ‘अरे अजइया, सुशांत बिहारी था। कम से कम बिहारी होने के नाते तो उसके पक्ष में बोलो। उसके लिए न्याय की मांग करो।’ बता दूं कि बिहार के सुपौल जिले के बीरपुर में मेरी स्कूली शिक्षा हुई है। सुशांत सिंह राजपूत की बिहारी पहचान उनकी संदिग्ध मौत के बाद मुखर हुई है। उसके पहले कम ही लोग जानते थे कि वे बिहार से हैं। वह इंटरव्यू में अपनी बिहार की पृष्ठभूमि का उल्लेख नहीं करते थे।

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हम सभी जानते हैं कि मनोज वाजपेयी बिहार के बेतिया जिले के बेलवा गांव के हैं। इसी प्रकार पंकज त्रिपाठी गोपालगंज के बेलसंड गांव के हैं। शत्रुघ्न सिन्हा तो बिहारी बाबू के नाम से जगत विख्यात हैं। शेखर सुमन ने भी बिहारी पहचान को हमेशा जाहिर किया। सुशांत सिंह राजपूत के बारे में कुल जानकारी यही है कि वह पटना के थे। अमूमन हर बिहारी का एक गांव या कस्बा होता है। सुशांत सिंह राजपूत के गांव के बारे में जानकारी 2019 में मिली, जब वे पूर्णिया के मलडिहा में 17 सालों के बाद पहुंचे। बिहार से प्रकाशित अखबारों में तब यह खबर बनी थी।

कोलकाता में सुशांत का चित्र बनाकर श्रद्धांजलि देता एक कलाकार

2013 में ‘काय पो छे’ की रिलीज के समय उन्होंने अपना पीआरओ रखा था। उन दिनों हिंदी और अंग्रेजी मीडिया के सीनियर पत्रकारों से उन्होंने बातें कीं। मुझे याद है कि उस मुलाकात में मेरे आदतन पृष्ठभूमि पूछने पर उन्होंने खुद को दिल्ली का ही बताया था। बाद में एक पत्रकार मित्र से उनके बिहारी होने की जानकारी मिली तो मैंने अगली मुलाकात में पूछ लिया, ‘क्यों सुशांत, आप तो बिहार से हैं? कहां के हैं?’ थोड़ा झेंपते और मुस्कुराते हुए उन्होंने बताया था, ‘पटना से हैं। लिखिएगा मत।’ ऐसे ही ‘एम एस धोनी’ की रिलीज के समय जब कुछ युवा पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आप तो पटना से हैं तो धोनी की भाषा पकड़ने में दिक्कत नहीं हुई होगी? इस पर उन्होंने कहा, ‘नहीं, मैं पटना से नहीं हूं। मैं तो दिल्ली में पढ़ा-लिखा हूं।’ हालांकि अभी हाल में उनके बारे में सब जगह छपा कि उनकी स्कूलिंग पटना में हुई थी।

मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्री बताएंगे कि एक लोकप्रिय अभिनेता अपने जीवन काल में क्यों और किस-किस ग्रंथि के चलते अपनी मूल पहचान छिपाता है। लेकिन दिलचस्प बात यह कि वही अभिनेता मौत के बाद कुछ कारणों से अचानक उसी पहचान का प्रतीक बन जाता है। बिहार सरकार की अनुशंसा पर सुशांत प्रकरण को सीबीआई ने अपने हाथों में लिया है। 5 अगस्त को नीतीश कुमार ने ट्वीट किया ‘स्वर्गीय सुशांत सिंह राजपूत के पिता द्वारा पटना में दर्ज कराए गए मामले की सीबीआई जांच कराने हेतु राज्य सरकार की अनुशंसा को केंद्र ने स्वीकार कर लिया है। इसके लिए केंद्र सरकार को धन्यवाद! आशा है कि अब बेहतर जांच हो सकेगी और न्याय मिल सकेगा।’ अभी कुछ दिनों पहले बीजेपी के कला और संस्कृति प्रकोष्ठ ने बिहार में सुशांत सिंह राजपूत के लिए ‘ना भूले हैं! ना भूलने देंगे!!’ के स्टिकर और पोस्टर छपवा कर बांटे।

2013 में फिल्म जगत में उनके चर्चित होने से लेकर उनकी मृत्यु के दिन तक बिहार सरकार ने कभी सुशांत सिंह राजपूत की सुध नहीं ली। कभी कोई सम्मान या पुरस्कार नहीं दिया, न ही किसी विभाग का ऐम्बैसडर नियुक्त किया। अचानक मौत के बाद सभी को ख्याल आया कि वह बिहारी थे। अब बिहार चुनाव का परिणाम बताएगा कि बीजेपी या जेडीयू में किसे इस प्रकरण को जीवित रखने से कितना फायदा हुआ।

बिहारी पहचान को लेकर चुनावी मुद्दा बनती सुशांत की मौत

बिहार सरकार की फिल्मों में अरुचि जाहिर है। पिछले कुछ सालों से रुक-रुक कर चल रहा फिल्म फेस्टिवल बंद हो चुका है। बार-बार की गई घोषणाओं के बावजूद अभी तक बिहार में फिल्म सिटी की स्थापना पर ठोस फैसला नहीं लिया जा सका है। बिहार सरकार बिहारी कलाकारों को कोई सम्मान और पुरस्कार भी नहीं देती, जबकि मूक सिनेमा के दौर से बिहारी कलाकार फिल्मों से जुड़ते रहे है। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता कलाकारों और निर्देशकों को बुलाने और सम्मानित करने की औपचारिकता भी कभी नहीं निभाई मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी सरकार ने। लेकिन इस समय सुशांत सिंह राजपूत की ‘बिहारी पहचान’ को लेकर दोनों बड़े विकल हैं।

मुझे याद है, पटना में हो रहे एक फिल्म फेस्टिवल के लिए स्वयं मैंने और फेस्टिवल के अधिकारी प्रशांत कश्यप ने सुशांत सिंह राजपूत को बुलाने की बार-बार कोशिश की। वह हर बार टालते रहे। उन्होंने मुझसे तो नहीं लेकिन प्रशांत कश्यप से आग्रह किया कि ‘बिहारी पहचान के साथ पटना में ना बुलाएं। मैं किसी और इवेंट में आ जाऊंगा।’ अभी कुछ महीने पहले फरवरी 2020 में बिहार के पूर्णिया जिले की 250वीं वर्षगांठ थी। पूर्णिया महोत्सव के आयोजक भी पूर्णिया के मलडिहा गांव के मूल निवासी और लोकप्रिय चेहरे सुशांत सिंह राजपूत को बुलाने की कोशिश में नाकाम रहे। बार-बार आग्रह के बावजूद सुशांत पूर्णिया जाने के लिए राजी नहीं हुए।

मत बुलाओ पटना
दरअसल, यह अकेले सुशांत का मामला नहीं है। पहचान छिपाने की कोशिश बिहार के साथ जुड़े पिछड़ेपन की वजह से भी प्रचलित है। मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में तो कलाकारों के लिए अलिखित अनिवार्यता है कि वे अपनी भाषा और लहजा छोड़ें। मानक उच्चारण करें। सभी हिंदी प्रदेशों से आए कलाकार इस समस्या से जूझते हैं। बिहार के अधिकांश कलाकार सार्वजनिक तौर पर अपनी मातृभाषा (भोजपुरी, मैथिली और मगही) में बातें करते सुनाई नहीं पड़ते। प्रसंगवश, अनुभव सिन्हा और मनोज वाजपेयी को भी भोजपुरी में ऑडियो-विजुअल मीडियम में कुछ करने में 20 साल से अधिक समय लग गया। उनका भोजपुरी रैप ‘बंबई में का बा?’ हाल ही में आया है।

 

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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